Saturday, March 16, 2013

नियति ...

लोग कहते हैं,
उसे जाने दो 
जो कभी तुम्हारा था ही नहीं 
और अगर वाकई 
वो तुम्हारा होगा 
तो आयेगा वापस 
मुस्कुराते हुए 
फिर से तुम्हारे ही पास 
मीलों की दूरी करके तय...

चुपचाप, बेबस, लाचार,
मान लेती हूँ  मैं 
वक़्त के इस ज़ख्म को 
अपनी नियति मानकर,
आख़िर
तुम्हारा दूर जाना 
एक ज़ख्म ही तो है 
मेरी आत्मा पर...
मुझे आदत  जो नहीं है 
तुम्हारे एहसास को भूल कर 
महफ़िल में मुस्कुराने की 
और पथरायी आँखों में 
तुम्हारे गुलाबी, महके हुए 
सपने सजाने की...

अपनी मर्ज़ी से आना तुम्हारा, 
वक़्त की मर्ज़ी से जाना तुम्हारा, 
और बीच में हूँ मैं 
किसी पेंडुलम की तरह 
निर्लक्ष्य झूलती हूयी 
तुम्हारी मर्ज़ी 
और वक़्त की मर्ज़ी के बीच,
क्योंकि मेरे पास 
है ही नहीं मेरी मर्ज़ी 
जोकि तुम्हें पा सकूँ,
तुम्हें चाह सकूँ,
तुम्हें रोक सकूँ...

मेरे पास तो है बस 
मेरी नियति 
वक़्त से, हालातों से 
और तुमसे लड़ती हुयी...

Friday, August 3, 2012

दर्द...

कुछ शब्द,
जिनका अर्थ शायद कोई
समझ ना सके,
अपने मायने खो देता है...


कुछ ज़ख्म,
जिनका दर्द शायद कोई
महसूस ना कर सके,
अपने एहसास खो देता है...


कुछ शब्द समझा नहीं पाते
दर्द के एहसास को,
और कुछ दर्द ऐसे भी हैं
जो शब्दों में बयान नहीं हो पाते...


क्यूँ जुबां तक आते-आते
दर्द आँखों से बह जाता है,
और क्यूँ ज़ख्मों को वक़्त पर
शब्द नहीं मिल पाता है...


क्यूँ उम्मीदों को हमेशा
ठोकरें मिला करती हैं,
और क्यूँ सपनों को हमेशा
हकीकत छला करती हैं...


आस-पास कोई अपना नहीं,
आँखों में कोई सपना नहीं,
गुज़रती ज़िन्दगी में कल नहीं,
हँसते-मुस्कुराते दो पल नहीं...


बस ये दर्द ही साथ रहता है,
जिंदा होने का एहसास रहता है...

Saturday, May 26, 2012

संपूर्ण प्रेम और मनुष्य

मनुष्य,
जो पैदा हुआ है
अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण,
कुछ अर्थपूर्ण उद्देश्य को
प्राप्त करने के लिए,
मुश्किल से समझ पाता है
अपने जीवन के
उन्हीं उद्देश्यों को...

कई तरह के उद्देश्यों में से,
शायद,
संपूर्ण प्रेम के अर्थ को समझना ही
मनुष्य का सबसे अहम्,
सबसे जीवंत उद्देश्य हो...

प्रेम का अस्तित्व
कहीं और नहीं मिलता,
संपूर्ण सृष्टि की,
संपूर्ण शक्ति से,
अपनी मानसिक चेतना को
जागृत करने पर
स्वतः ही ये ज्ञात हो जाता है
कि संपूर्ण प्रेम का आधार
स्वयं मनुष्य के भीतर ही है...

इस सृष्टि का
बेहतर और बदतर होना,
मनुष्य के स्वयं के
बेहतर और बदतर होने से जुड़ा है...

संपूर्ण प्रेम की ताकत  ही
मनुष्य को बेहतर बना सकती है,
क्योंकि मनुष्य की चेतना
संपूर्ण प्रेम से जागृत हो कर,
मनुष्य को हमेशा
बेहतर से बेहतर बनाने की ही
चेष्टा करती है...

और अंततः
वो एक क्षण आ जाता है
जब मनुष्य को
ये ज्ञात हो जाता है
कि उसके जीवन का
अब तक का अनजाना उद्देश्य
क्या है,
संपूर्ण प्रेम का अर्थ
क्या है,
और उसका मनुष्य होना
क्या है...

Monday, May 7, 2012

काश तुम साथ चलते...

कठिन था बहुत मेरी मंज़िल का सफ़र,
बड़ी उम्मीद थी तुमसे, काश तुम साथ चलते...

ख़बर थी मुझे कि तमाम-उम्र कोई साथ नहीं देता,
दो चार कदम  ही सही, काश तुम साथ चलते...

तुम्हारे आने की आहट ने जगाया मुझे ख़्वाबों से,
हक़ीकत ना सही ख़्वाबों में ही सही, काश तुम साथ चलते...

खिली धूप, महकती राह में हमें साथ चलना था,
वीराने भी बहार बन जाते, काश तुम साथ चलते...

इक मेरे दिल को ही नहीं थी आरज़ू तेरी जुस्तजू तेरी,
मैंने ज़िन्दगी तुझपे वारी थी, काश तुम साथ चलते...

समझा के मुझे बेफ़िक्री से तुम अपनी राह निकल गए,
साथ होते तो ये मंज़र बदलता, काश तुम साथ चलते...

खुद ही फ़ैसला कर के मुझे तनहा छोड़ दिया तुमने,
खाके मेरी तन्हाई पे तरस, काश तुम साथ चलते...

माना की रिश्तों में बड़ा दर्द था, बड़ी तकलीफ़ थी,
मेरी मुहब्बत को याद करके ही सही, काश तुम साथ चलते...

Wednesday, January 18, 2012

ख़्वाब टूट गया...

कितनी मुद्दतों के बाद

कल रात मिले थे

जब ख़्वाबों में हम,

तुम्हारे अक्स को देखा

और हकीकत मान लिया मैंने...

कंपकंपाती हुयी उँगलियों से

छूकर तुम्हारे चेहरे को

महसूस करना चाहा था जब,

बड़ा सर्द था वो एहसास

तुम्हारी छुअन का...

महकती हुयी सी खुशबू

जो हर घड़ी, हर लम्हा

मेरे अरमानों से जुड़ी रहती है,

ख़्वाबों में भी बांधे रखती थी

मेरा तुम्हारा दामन...

आज क्यूँ ऐसा हुआ

कि तुम्हारा मेरे सामने होना

मुझे प्रतीत न हुआ!

तुम्हारी छुअन, तुम्हारी महक

मुझे महसूस ना हो सकी...

माना कि ख़्वाबों और हकीकत में

ज़मीन से फ़लक का फासला है

पर एक रोज़,

मेरी ज़ुल्फों के साये में

बड़ी मासूमियत से तुमने ही कहा था

कि हमारे दरम्यान कोई फासला नहीं,

कोई बंधन नहीं...

फिर क्यूँ आज ख़्वाबों में

तुम्हे छूना, तुम्हे महसूस करना

मेरे लिए मुमकिन ना था!

तुम्हे पाने की चाहत मेरी

ख़्वाबों में भी पूरी ना हो सकी,

तरसती हुयी छलकती आँखें

संजो ना सकी तुम्हे पाने का अरमान

और हमेशा की तरह फिर से

मुद्दतों बाद देखा हुआ ख्वाब,

एक पल में ही टूट गया...

Monday, January 16, 2012

तलाश...

ज़िन्दगी भर
बस भागते ही रहना,
एक अनजानी तलाश के पीछे,
जहाँ कुछ भी हाथ नहीं आता,
जहाँ कुछ भी मन नहीं पाता,
झुंझला के रख देता है मुझे...
आज तक ये ना समझा मन
कि इसे तलाश किसकी है,
और यही अनजानी, अनसुलझी तलाश
कभी पूरी ना हो पाई,
गोया मेरी किस्मत में
बस भागना ही लिखा है...
ज़िन्दगी जीने के वक़्त
बेसबब भागना
ना तो तलाश पूरी करता है,
ना ही ज़िन्दगी जीने देता है
और धीरे-धीरे
हाथ से छूटता जाता है सबकुछ
पीछे,
कहीं दूर...

Tuesday, November 8, 2011

बड़ी-बड़ी काली आँखों के सपने...

वो करती थी मुझसे
अपने सपनों की बातें
मेरे सीने से लिपट कर,
और चौंधियां जाती थी
उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखें
ढेर सारी खुशियों से...
उसका चहकना वैसा ही होता,
जैसे पहली बार
किसी चिड़िया का बच्चा
अपने पंख फैला कर
फुदकता हुआ निकल पड़ता हो
नापने सारा आसमान...

उसके सपने भी
कुछ ऐसे ही मदमस्त होते,
हाथ बढ़ा कर आसमान छूने की चाहत
किसे नहीं होती आखिर...
पर उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखें,
बयां कर देती
उसके सपनों की बुनियाद को,
उम्मीद को, हौसले को...

फिर अचानक होता था,
उसके सपनों पर प्रतिघात
और बिखर जाते थे
उसके मासूम, प्यारे से सपने
ठीक वैसे ही,
जैसे कि एक नाज़ुक गुलाब को
जब तोड़ा जाता है डाली से
जबरदस्ती, ज़ोर लगा कर,
तो छन से बिखर जाता है वो
कई पत्तियों में...

लेकिन हर बार
वो फिर से करती कोशिश,
समेटती अपने सपने
और बसाती उनको
अपनी बड़ी-बड़ी काली आँखों में...
फिर से हौसला देती
अपने सपनों की बुनियाद को,
एक नयी उमंग से
और उठ खड़ी होती
इन सपनों के दम पे,
अपनी नियति से लड़ने को...

Monday, November 7, 2011

फ़र्क...

मैं, मैं हूँ
तुम, तुम हो...
मैं कभी "तुम" नहीं हो सकती,
तुम कभी "मैं" नहीं हो सकते.
मेरे और तुम्हारे बीच
सिर्फ़ एक शरीर की संरचना का फ़र्क नहीं,
बल्कि फ़र्क 
सोच का, संवेदनाओं का,
सपनों का, भावनाओं का,
हृदय और मस्तिष्क से
काम करने की प्रवृत्ति का...
ये कुछ फ़र्क
तुम्हें "तुम" बनाते हैं
और मुझे "मैं"...
तुम जहाँ कुछ खोना नहीं जानते,
वहीं मैं कुछ पाना नहीं जानती.
क्योंकि तुम कभी कुछ खोते नहीं,
और मैं हर बार कुछ पाती नहीं...