Thursday, April 25, 2013

मेरे अरमानों की चादर

बेख़बर थे तुम कुछ ऐसे
मेरी नज़रों के सामने
गहरी नींद में सोये हुए,
कि तुम्हें आज तक भी 
चल ना पाया 
इस बात का पता 
कि अपनी पसंद की 
रेशमी सफ़ेद चादर में,
कई सिलवटों के साथ 
तुम्हें मासूमियत से सोता देख 
उड़ जाती है कहीं दूर 
मेरी आँखों से नींद...

ना जाने कितनी रातें 
बीत गयी हैं यूँ ही 
तुम्हें एकटक देखते-देखते 
और उस मीठे से सपने को 
अपने मन में सोचते-सोचते,
जो तुम्हारी नींद की गहराई से भी 
तुम्हारे चेहरे पर ल देता है 
कई रंगों की मुस्कान...

हर रात सजाती हूँ मैं 
अनगिनत अरमानों के सपने,
सिलती हूँ उन्हें फिर 
विश्वास के धागे से 
और बड़ी मेहनत से 
बना कर एक प्यारी सी चादर,
ओढ़ा देती हूँ तुम्हें, 
ताकि तुम्हारी उस 
रेशमी सफ़ेद चादर की सिलवटें 
कर ना सकें मुकाबला 
मेरे अरमानों की चादर से...

9 comments:

  1. कितनी आशा और विश्वास से बुनी अरमानों की चादर ..... मर्मस्पर्शी भाव

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  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (27 -4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  3. bahut hi pyari si apni si lagti Rachna

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  4. अरमानों की चादर का विस्तार कम न हो....
    बहुत सुन्दर!!!

    अनु

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  5. बहुत ही सुन्दर रचना! मेरी बधाई स्वीकारें।
    कृपया यहां पधार कर मुझे अनुग्रहीत करें-
    http://voice-brijesh.blogspot.com

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  6. आपकी यह सुन्दर रचना निर्झर टाइम्स (http://nirjhar-times.blogspot.com) पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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