Saturday, January 29, 2011

तुम्हें करके शामिल...

मर के इक दिन मिट्टी में मिल जाना है मुझे,
उसी मिट्टी में बनके फूल, खिल जाना है मुझे...

चुपके से तुम्हारे सपने में आ जाना है मुझे,
उसी सपने में तुम्हें चुरा के, पा जाना है मुझे...

बारिश के बाद की उजली रात सा हो जाना है मुझे,
उसी रात में इक चमकता चाँद, हो जाना है मुझे...

जुदा हो कर भी तुम्हारी दुआ बन जाना है मुझे,
उसी दुआ में तुम्हारी याद, बन जाना है मुझे...

तुम्हारी चाहत में बनके आँसू बह जाना है मुझे,
उसी आँसू में जुदाई का गम भी, सह जाना है मुझे...

चंद लम्होँ की ज़िन्दगी में दो पल बिता ले जाना है मुझे,
उसी पल में सबको हसीन खुशियाँ, दे जाना है मुझे...

तेज़ आँधियों में भी अपना वजूद पहचान जाना है मुझे,
उसी वजूद मेँ तुम्हें करके शामिल, अपना मान जाना है मुझे...

20 comments:

  1. नए अंदाज़ में एक बेहतरीन गज़ल. आभार .

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  2. वाह मिताली जी बहुत सुन्दर, मन प्रशन्न हो गया
    बहुत बहुत धन्यवाद

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  3. हर शेर एहसासों से भरा ...आपका शुक्रिया

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  4. मन को छू जाने वाले भावों से लबरेज ......शानदार

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  5. तुम्हारी चाहत में बनके आँसू बह जाना है मुझे,
    उसी आँसू में जुदाई का गम भी, सह जाना है मुझे...

    दर्द भरी ...खूबसूरती से कही ..अच्छी गज़ल

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  6. जुदा हो कर भी तुम्हारी दुआ बन जाना है मुझे,
    उसी दुआ में तुम्हारी याद, बन जाना है मुझे...

    वाह... इस भावपूर्ण रचना के लिए बधाई...
    नीरज

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  7. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  8. सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  9. एक भविष्यक्ता की तरह आपने आज-कल और कल की बातें गज़ल में ढाल दी। सब कुछ आप ही सह रही हैं सामनेवाले की भी हिस्सेदारी होती है कुछ जिसका आपने ज़िक्र नहीं किया। एक लयबद्ध भाव के पठन के बाद ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। अहसासों का खूबसूरत चित्रण।

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  10. मिताली पुनेठा जी

    नमस्कार !
    कुछ समय बाद आपके यहां आया हूं … दिसंबर में आपके यहां गीत पढ़ कर गया था, जो बहुत पसंद आया ।
    उसकी तुलना में यह रचना कम रुची ।
    निराशा की तो आपकी आयु भी नहीं , रचनाओं में भी इससे बचना चाहिए ।
    … लेकिन मेरे कमेंट से निराश मत हो जाना , प्लीज़
    हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  11. बहुत ही बढ़िया लगी आपके सपनों की ये दुनिया और यह रचना भी.

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  12. चंद लम्होँ की ज़िन्दगी में दो पल बिता ले जाना है मुझे,
    उसी पल में सबको हसीन खुशियाँ, दे जाना है मुझे...

    बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति..मन को छू गयी

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  13. Har lamhe ko sapno me jee rahi hai aap..
    hakiqat kaa samna kijiyega kabhi
    har hakiqat me aapko sapne ki mehak milegi..

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  14. सुदर रचना मिताली जी ... आभार...

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  15. बहुत ही सुंदर रचना......दिल को छु गयी...आपकी लेखनी में गजब का जादू है...लाजवाब।

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  16. aap sabhi ka hardik aabhaar vyakt karti hu...koshish karungi ki kabhi meri rachnaon se kisi ko bhi nirash na hona padhe...rajendra ji, aapki tippani ko main dhyan me rakhungi aur koshish karungi ki sahi disha me agrasar rahun...ek baar fir se, aap sabhi ka shukriya...

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  17. चंद लम्होँ की ज़िन्दगी में दो पल बिता ले जाना है मुझे,
    उसी पल में सबको हसीन खुशियाँ, दे जाना है मुझे...

    यह चंद लम्हे कभी कभी पूरे जीवन में नहीं जी पाते.... बहुत सुंदर

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  18. चुपके से तुम्हारे सपने में आ जाना है मुझे,
    उसी सपने में तुम्हें चुरा के, पा जाना है मुझे...

    किसी ने सच ही कहा है काश सब सपने अपने होते
    बहुत अच्छी रचना है

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