Saturday, August 21, 2010

क्योँ इश्क मेँ ???

क्योँ ज़माने भर मेँ
ये चर्चा आम हो गया,
इश्क करने वाला हर
शख़्स बदनाम हो गया...

जहाँ चँदा-चकोरोँ की
मिसालेँ दी जाती थी कभी,
देखो खराब आज वहीँ
कबूतरोँ का नाम हो गया...

कोई बँदिश सिर इश्क का
जहाँ झुका ना सकी कभी,
इज़्जत के नाम पर वहीँ
आज कत्लेआम हो गया...

पीना पड़ा था मीरा को भी
विष का प्याला कभी,
लेकिन आज हर घर मेँ
ये किस्सा आम हो गया...

मौत को गले लगाना
मजबूरी होती थी कभी,
पर इश्क करने वालोँ का
आज यही अंजाम हो गया...

18 comments:

  1. क्योँ ज़माने भर मेँ ये चर्चा आम हो गया
    इश्क करने वाला हर शख़्स बदनाम हो गया
    शेर बहुत खूब , मुवारक हो

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  2. इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते तो जी आप कब तक छुपाएंगे...और ये जमाना तो उसी का दुश्मन है. लेकिन है न हैरानी वाली बात की सब बड़े जो बचपन से सीख देते हैं की प्यार मुहोब्बत से रहो वही प्यार मुहोब्बत के सबसे बड़े बैरी हो जाते हैं.

    अच्छी रचना.

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  3. बहुत सुंदर रचना...

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  4. waaw....gr8 poem..... mitali is back with a bang!!!!! :)

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  5. yaqeenan behad khoob likha hai
    badhai
    ye panktiyan bahut achchhee lageen
    पीना पड़ा था मीरा को भी
    विष का प्याला कभी,
    लेकिन आज हर घर मेँ
    ये किस्सा आम हो गया...

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  6. पीड़ा व्यक्त दिल को छू लेने वाली रचना लगी, बहुत खूब शब्दों को पिरोया है आपने ।

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  7. i like ur consistency .. i wonder how.. how can anyone can be so consistent with creativity.... there r people who write well, there r people who r consistent, but u r the combo of the said two...
    i would like to learn this art from u... keep it up.... :)
    hope to see many more....

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  8. bahut sundar....

    kabhi mere blog par bhi aaye!

    www.gaurtalab.blogspot.com

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  9. पीना पड़ा था मीरा को भी
    विष का प्याला कभी,
    लेकिन आज हर घर मेँ
    ये किस्सा आम हो गया...
    वाह, सुन्दर रचना...सशक्त प्रस्तुति...बधाई.
    __________________
    'शब्द सृजन की ओर' में 'साहित्य की अनुपम दीप शिखा : अमृता प्रीतम" (आज जन्म-तिथि पर)

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  10. मिताली

    अच्छा लिखा है …
    पीना पड़ा था मीरा को भी
    विष का प्याला कभी


    बहुत ख़ूबसूरत …

    बहुत सारी शुभकामनाएं !
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  11. Mitaliji,
    bahut sundar abhivyakti

    http://sanjaykuamr.blogspot.com/

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  12. पीना पड़ा था मीरा को भी
    विष का प्याला कभी,
    लेकिन आज हर घर मेँ
    ये किस्सा आम हो गया...
    ....बहुत सुन्दर रचना.

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  13. कोई बँदिश सिर इश्क का
    जहाँ झुका ना सकी कभी,
    इज़्जत के नाम पर वहीँ
    आज कत्लेआम हो गया...

    बिल्कुल सच्चाई से रूबरू करती एक सुंदर अभिव्यक्ति..बढ़िया रचना..बधाई

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  14. जहाँ चँदा-चकोरोँ की
    मिसालेँ दी जाती थी कभी,
    देखो खराब आज वहीँ
    कबूतरोँ का नाम हो गया...

    हां न ! कहते कबूतर बाजी कर रहा है। नादान कहीं के।

    पीना पड़ा था मीरा को भी
    विष का प्याला कभी,
    लेकिन आज हर घर मेँ
    ये किस्सा आम हो गया...
    यानी मीरां को कुर्बान करने की इनकी आदत हो गई। जरायम पेषा हो गए!!

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  15. aadarniy mitali punetha ji namaskar , darde dil ke waste paida kiya insan ko barna ibadat ke liye kya fariste km the lokatantr me sabko barabar adhikar hai jitana mohabbat ko utana hi nafarat ko , utanahi samaj ko kahan tk shikayt karenge, nadi ki manjil samundr hai isliye wah apane beg ko nahi mod sakati , jo nadi beg ko modane ka prayash karata hai wah sukhakar biran ho jati hai ya ek chhote se talab ke rup me pariwartit ho jati hai khubasurat jindagi jindabad jaisa bhi achchha hai
    arganikbhagyoday.blogspot.com

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  16. Very beautiful n very true...

    Kya pata k Meera ko kurbaan karna zamane ki aadat ho gayi ya Meera khud kurbaani ki aadi ho gayi h..

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